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Definition of unemployment | rate and reason in india अगर आप सिविल सर्विस परीक्षा या स्टेट पीसीएस की तैयारी करते हैं तो आज हम आपके लिए गरीबी एवं बेरोजगारी से संबंधित महत्वपूर्ण पॉइंट लेकर आए हैं जिन्हें पढ़ना आपके लिए अत्यंत आवश्यक है बेरोजगारी की परिभाषा | दर, प्रकार एवं कारण ? सिविल सर्विस परीक्षा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए यह टॉपिक बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि अधिकांश बार  भारत में गरीबी एवं बेरोजगारी पर निबंध भी पेपर में लिखवाया जाता है इसके लिए आपको संपूर्ण जानकारी आज के इस टॉपिक में विस्तार पूर्वक मिलेगी

  बेरोजगारी का मुख्य कारण क्या है? सिविल सर्विस परीक्षा की तैयारी करने वाले विद्यार्थी ( UPSC, STATE PCS, RPSC, BPSC, SSC, NDA )  एवं अगर आप अन्य किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी भी कर रहे हैं तो भारत में गरीबी एवं बेरोजगारी से संबंधित महत्वपूर्ण पॉइंट्स आपको पढ़ने चाहिए  जिससे आपको देश की आर्थिक स्थिति के बारे में कुछ जानकारी मिल सके 

बेरोजगारी की परिभाषा | दर, प्रकार एवं कारण ? Definition of unemployment | rate and reason in india

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ग्रामीण एवं शहरी बेरोजगारी के प्रकार, कारण एवं उपाय | बेरोजगारी की परिभाषा

चक्रीय बेरोजगारी  (cyclical unemployment )- 

  • इस प्रकार की बेराजगारी अर्थव्यवस्था में चक्रीय उतार-चढ़ाव  के कारण पैदा होती है, जब  अर्थव्यवस्था में समृद्धि का दौर होता है तो उत्पादन बढ़ता है रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं।
  • जब अर्थव्यवस्था में मंदी का दौर आता है तो उत्पादन  कम होता है और कम लोगों की जरूरत होती है जिसके कारण बेरोजगारी बढ़ती है ।

प्रतिरोधात्मक व घर्षण जनित बेरोजगारी- (Frictional Un-employment) 

  • एक रोजगार/उत्पादन प्रक्रिया से दूसरे रोजगार/उत्पादन प्रक्रिया में प्रवेश के दौरान जितने समय बेरोजगारी की स्थिति होती है इसे घर्षण जनित बेरोजगारी कहते हैं।

विकासशील/अल्पविकसित देशों की बेरोजगारी :

  • विकासशील तथा अल्प विकसित देशों में जो बेरोजगारी पायी जाती है वह समग्र मांग की  कमी के कारण नहीं बल्कि संरचनात्मक होती है।
  • विकासशील देशों में पायी जाने वाली बेरोजगारी को दो भागों में बाँट सकते हैं।

शहरी क्षेत्रों में पाई जाने वाली बेरोजगारी :

1.औ‌द्योगिक श्रमिकों में पायी जाने वाली बेरोजगारी- विकास के कम दर की वजह।

2. शिक्षित बेरोजगारी- मुख्यतया: शहरी क्षेत्रों में पाई जाती है।

कारण –

  • दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली जिसका व्यावसायिक पहलू कमजोर है।
  • व्यावसायिक मांग या आवश्यकता के अनुरूप शिक्षा का न होना
  • रोजगार सृजन के अवसरों में धीमी वृद्धि है।

ग्रामीण क्षेत्रों में पायी जाने वाली बेरोजगारी –

1. मौसमी बेरोजगारी (Seasonal Unemployment) इस प्रकार की बेरोजगारी कृषि क्षेत्र में पायी जाती है।

  • कृषि क्षेत्र में लगे लोगों को कृषि की तुताई, बोवाई, कटाई आदि कार्यों के समय को रोजगार मिलता है, लेकिन जैसे ही कृषि कार्य खत्म हो जाता है तो कृषि में लगे लोग बेरोजगार हो जाते हैं ।

2. प्रच्छत्र बेरोजगारी – 

  • ऐसे लोग जिन्हें यदि खेत या कृषि से निकाल दिया जाए तो भी कृषि से प्राप्त कुल उत्पादन में कोई कमी नहीं होगी।
  • ऐसे श्रमिक जो ऊपर से देखने में तो रोजगार में लगे रहते हैं पर वास्तव में रोजगार में नहीं होते हैं।
  • कार्य करने पर भी सीमांत उत्पादकता शून्य।

3संरचनात्मक बेरोजगारी मांग ज्यादाउपलब्धता कम – तब प्रकट होती है जब बाजार में दीर्घकालिक स्थितियों में बदलावा आता है।

अन्य बेरोजगारी

1. ऐच्छिक बेरोजगारी :-

  • ऐसा व्यक्ति अपनी इच्छा से काम करने को तैयार नहीं।
  • प्रचलित मजदूरी दर पर काम न करके ज्यादा मजदूरी की मांग ।

2. खुली या अनैच्छिक बेरोजगारी:

  • वह अवस्था जिसमें व्यक्ति कार्य की मांग करता है परन्तु रोजगार की उपलब्धता नहीं होती है।
  • कोरोना वायरस के चलते भारत में बेरोजगारी दर 9.1% तक बढ़ गई है। (Dec.2020)

मापक का आधार :- छठी योजना में रोजगार नापने के लिए “स्टेण्डर्ड वर्ष” Standard Year का प्रयोग हुआ था। जिसके अनुसार यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन 8 घंटे  कार्य के साथ 273 दिनों तक रोजगार में है तो उसे पूर्ण रोजगार में कहेंगे।

भगवती कमेटी (1973)ने बेरोजगारी के माप के लिए तीन धारणाओं की संस्तुति  की :-

  1. सामान्य स्टेटस या स्थित (US) :  यदि कोई व्यक्ति वर्ष के अधिकांश 273 दिनों तक  कार्य नहीं करता है तो उसे सामान्य स्टेटस का बेरोजगार कहेगें।
  2. चालू या वर्तमान साप्ताहिक स्टेटस (CWS) : इस स्थिति के अंतर्गत उस व्यक्ति को बेरोजगार कहा जाता है जो एक सप्ताह में 1 घंटे के लिये भी काम पाने में असफल रहा है।
  3. चालू दैनिक व वर्तमान दैनिक स्टेटस (CDS) : इसके अंतर्गत यदि किसी व्यक्ति को एक दिन में चार घंटे का काम उपलब्ध हो तो इसे अर्द्ध दिवस व आधे दिन का रोजगार माना जाता है।

4 घंटे      –           अर्द्धदिवस

           5-8 घंटे   –           पूर्ण दिवस

  • जहाँ सामान्य स्टेटस बेरोजगारी दर तथा साप्ताहिक स्टेटस बेरोजगारी व्यक्ति दर (person rate) है वहीं चालू दैनिक स्टेटस समय दर (time rate) प्रदर्शित करती है।
  • 11वीं पंचवर्षीय योजना में CDS को ही देश में रोजगार व बेरोजगारी के अनुमान के लिए प्रयोग में लिया गया था।

बेरोजगारी की गणना

  • N.S.S.O. – राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन 1950 मुख्यालय – कलकत्ता
  • 23 मई, 2019 को NSSO तथा C.S.O ने मिलकर N.S.O. (National Statistical Organization) बना दिया है, जो बेरोजगारी की गणना करता है।

बेरोजगारी के कारण :

  • रोजगार विहिन आर्थिक संवृद्धि सेवा
  • अनुपयोगी उत्पादन प्रक्रिया
  • अनुपयोगी शिक्षा व्यवस्था
  • जनसंख्या वृद्धि – संसाधनों पर बढ़ता दबाव
  • अवसंरचना का कमजोर स्तर
  • निवेश की कमी
  • सरकारी कानून व प्रतिबन्ध
  • वित्तीय संगठनों की अक्षमता
  • रोजगार हेतु कृषि पर निर्भरता निम्न उत्पादकता, छुपी बेरोजगारी।
  • कौशल व प्रशिक्षण सुविधा (Skill Indida) का अभाव

फिलिप्स वक्र :

  • फिलिप्स नामक अर्थशास्त्री द्वारा बेराजगारी तथा मुद्रास्फीति में विपरीत सम्बन्ध प्रस्तुत किया गया है।
  • फिलिप्स वक्र कुल मांग और कुल आपूर्ति के पारंपरिक व्यापक आर्थिक मॉडल पर आधारित है। 
  • मुद्रास्फीति वस्तुओं और सेवाओं की बढ़ती मांग का परिणाम है ।

           Inflation             Unemployment
              8%                               1.5%
              0%                                 3%

उपर्युक्त चित्र में – बेरोजगारी प्राकृतिक दर से कम है तो मुद्रास्फीति सकारात्मक होती है और बेरोजगारी प्राकृतिक दर से अधिक होती है तो मुद्रास्फीति नकारात्मक होती है।

फिलिप्स वक्र सकारात्मक और नकारात्मक मुद्रास्फीति दर दोनों के लिए बेरोजगारी पर प्रभाव का वर्णन करता है।

योजनाएँ

ग्रामीण  6 योजनाएँ

  1. समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP/1978/79)
  2. ग्रामीण युवाओं को स्वरोजगार हेतु प्रतिशक्षण (TRYSEM-1979)
  3. ग्रामीण महिला तथा बाल विकास-1984
  4. ग्रामीण दस्तकार उन्नत औजार वितरण (SITRA-1992)
  5. दस लाख कुआँ योजना (MWS-1996)
  6. गंगा कल्याण योजना (GKY -1997)-
  • अप्रैल, 1999 को इन  6 योजनाओं को मिलाकर  स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना कर दिया गया।
  • 3 जून, 2011 को स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोजगार योजना का नाम बदल कर राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) कर दिया गया ।
  • 25 सितम्बर, 2014 में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) का विलय   पण्डित दीनदयाल उपाध्याय शहरी आजीविका कार्यक्रम में कर दिया गया जिसमें केंद्र सरकार (60%) व राज्य सरकार (40%) का योगदान होगा।

शहरी :-

  1. गरीबों हेतु शहरी बुनियादी सेवा
  2. नेहरू रोजगार कार्यक्रम अप्रैल, 1989
  3. P.M. शहरी गरीबी निवारण योजना
     इन तीनों योजनाओं को मिला कर दिसम्बर, 1997 में स्वर्ण जयन्ती शहरी स्वरोजगार योजना कर  दिया गया।
  4. सितम्बर, 2013 में स्वर्ण जयन्ती शहरी स्वरोजगार योजना को   राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (NUM) मे बदल दिया गया।
  5. फरवरी, 2016 में पण्डित दीनदयाल उपाध्याय शहरी आजीविका मिशन में राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (NUM) का विलय कर दिया गया । जिसमें केंद्र सरकार (60%) व राज्य सरकार  (40%) का  योगदान होगा।

मनरेगा :- महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारन्टी अधिनियम

  • नरेगा Act.:- 2005
  • लागू किया :- 2 फरवरी 2006
  • सम्पूर्ण देश में लागू :- अप्रैल, 2008
  • मनरेगा :- 2 अक्टूबर ,2009
  • 100 दिनों के रोजगार की गारन्टी ।
  • 15 दिनों तक रोजगार की उपलब्धता नहीं होने पर बेरोजगारी भत्ते का प्रावधान।
  • कार्य स्थल की दूरी 5 Km की परिधि में , इससे अधिक दूरी होने पर यात्रा भत्ते का प्रावधान।
  • कुल कार्य दिवसों में से जो रोजगार के लिए उपलब्ध करवाए गए है एक 1/3 रोजगार दिवस महिलाओं के लिए आरक्षण।
  • कार्य स्थल पर सुविधा युक्त स्थल की उपलब्धता ।
  • कुल योजना लागत का 60% खर्च मजदूरी में और 40% खर्च सामग्री खरीद में किया जायेगा।
  • कार्य का निर्धारण ग्राम सभी द्वारा।
  • स्थानीय स्तर पर अंकेक्षण का प्रावधान ।
  • प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत नरेगा मजदूरी में प्रतिदिन 20 रु की वृद्धि दर 1 वर्ष के लिए 2000 रु. की अतिरिक्त उपलब्धता।
  • मनरेगा योजना को सामाजिक सुरक्षा को बढ़ावा देने वाली कोर ऑफ कोर योजना में शामिल किया गया है जिसके तहत राज्य  केन्द्र सरकार की भागेदारी केन्द्र 75% – राज्य 25% के अनुपात में है।
  • कोर ऑफ  कोर योजना में 6 योजनाओं को शामिल किया गया है।

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Admin : Mission Upsc & Education

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