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General Science Pdf Notes in Hindi आज किस पोस्ट में हम आपके लिए general science notes pdf ( Environment and ecology ) पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी से संबंधित नोट्स ऐसे नोट्स लेकर आए हैं जो ऑफलाइन कक्षा में तैयार किए गए हैं यह नोट्स आपको सभी प्रतियोगी परीक्षाओं एवं सिविल सर्विस परीक्षाओं के लिए बहुत काम आने वाली है क्योंकि यह सामान्य विज्ञान का एक महत्वपूर्ण टॉपिक है जिसमें अधिकांश हर पेपर में प्रश्न पूछे जाने की संभावना अधिक रहती है

 General science environement class notes pdf अगर आप UPSC, SSC, UPPSC, PET, CTET, RAILWAY, POLICE, MTS, GD, POLICE या अन्य किसी भी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तो सामान्य विज्ञान में आपको पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी का यह टॉपिक जरूर पढ़ने को मिलेगा और इस पोस्ट के माध्यम से नीचे हमने आपको शॉर्ट नोट्स उपलब्ध करवा  दिए हैं जो आपको कम समय में अधिक तैयारी करने के लिए काम आएंगे अगर यह नोट्स अच्छे लगे तो इसे अपने दोस्तों एवं अन्य ग्रुप्स में जरूर शेयर करें 

general science notes pdf ( Environment and ecology ) पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी से संबंधित नोट्स

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पर्यावरण-   5 जून, 1972 स्टोक होम सम्मेलन

5 जून – पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।

पारिस्थितिकी-  शब्द- रिटर ने दिया था।

विस्तार से अध्ययन – O.P. ओडम

father of indian ecology – p. रामदेव मिश्रा

पर्यावरण के जैविक तथा अजैविक, घटकों का अध्ययन पारिस्थितिकी कहलाता है।

जीव – पर्यावरण की इकाई जीव कहलाती है।

– जीव एक कोशिका से लेकर अनेक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है।

– जीवों का एक जीवन चक्र होता है।

प्रजाति के प्रकार-

1. Key stone species- जीवों का वह समूह जिसकी तंत्र में संख्या कम हो लेकिन तंत्र पर प्रभाव सर्वाधिक हो।

जैसे – शेर, बाघ

2. एनेडेमिक प्रजाति – जीवों का वह समूह हो निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में निवास करता है, उसे एनेडेमिक प्रजाति कहा जाता है।

जैसे – आस्ट्रेलिया का कंगारु, न्यूजीलैण्ड में कीवी

3. एम्ब्रेला प्रजाति – जीवों का वह समूह जिसको बचाने के लिए सरकार द्वारा विशेष प्रयास किये जाते है, उसे एम्ब्रेला प्रजाति कहा जाता है।

जैसे- गोडावण, बाघ, शेर

4. Indigator(सूचक) प्रजाति- जीवों का वह समूह जो पर्यावरण की स्थिति को प्रदर्शित करता है।

जैसे –   ई-कोलाई – जल प्रदूषण की सूचक

लाइकेन – वायु प्रदूषण का सूचक, so2 प्रदूषण का सूचक

जीव – समष्टि- समुदाय – पारिस्थितिकी तंत्र

समुदाय – किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र की विभिन्न प्रजातियों के जीवों की कुल संख्या समुदाय कहलाती है।

A. सकारात्मक संबंध-

1. सहजीवी संबंध (+,+) – इस प्रकार के संबंध जिससे दोनों जीवों को लाभ होता है।

जैसे –

(i) लाइकेन – शैवाल + कवक

(ii). माइकोराइजा – उच्च पादप(साइकस पादप) + कवक            

(iii) राइजोबियम + लेग्यूमिनेसी पादप (दालों वाले पौधे) n278% होती है।

N = N (strong covalent land)

A2. सहभोजिता (+, o)- जिसमें एक जीव को लाभ तथा दूसरे जीव को ना लाभ, ना हानि।

उदाहरण :- अधिपादप (आरोही पादप) जैसे- बैल (चरती हुई गाय के पास मक्खियों का भिनभिनाना)

B. नकारात्मक संबंध –

1. परजीवी (छोटा लाभ) (+, -) – जीवों के मध्य ऐसा संबंध जिसमें एक जीव को लाभ हो तथा दूसरे जीव को हानि हो।

  • परजीवी हमेशा छोटा होता है तथा वो लाभ में रहता है।  
  • पोषक बड़ा होता है तथा वे हानि में रहता है

A. बाह्य परजीविता- इसमें परजीवी पोषक के शरीर के ऊपर होता है।

जैसे – मानव + मच्छर, मानव + जूँ, अमरबेल + अन्य पादप

आंतरिक परजीविता – इसमें परजीवी पोषक के शरीर के अंदर होगा।

जैसे – मानव + रोगाणु

मानव + मलेरिया

Brond/parasite परजीविता – ऐसे परजीविता, जिसमें कोई पक्षी दूसरों के घोसलों में अंडा देता है।

जैसे – कोयल, कौओं के घोंसले में अंडा देती है।

प्रतिस्पर्धा/संबंध – (+,-)

एमेनचलिज्म – (-,o) – एक को हानि, दूसरे को ना लाभ ना हानि।

जैसे – बबूल के पौधे के पास दूसरा पौधा विकास नहीं कर पाता है।

Eco-system – पर्यावरण की क्रियात्मक इकाई पारिस्थितिकी तंत्र कहलाती है।

  • पर्यावरण के जिस घटक का अध्ययन किया जाता है, उसे पारिस्थितिकी तंत्र कहते हैं।
  • वैज्ञानिक ए.जी. टेन्सले ने पारिस्थितिकी तंत्र शब्द दिया था।
  • ओडम  ने पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार से अध्ययन किया।
  • Eco system छोटा तथा बड़ा हो सकता है। जैसे – पानी की एक बूंद, ग्रह का अध्ययन

जैविक घटक – प्रकृति के सजीव घटक सम्मिलित है-

1. उत्पादक – प्रकृति के ऐसे जीव जो अपने भोजन का निर्माण स्वयं करे।

(transducer) – वर्तमान में उत्पादक को transducer कहा जाता है, जो प्रकाशिय ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तित करते है। जैसे – हरे पेड़-पौधे – ये प्रकाश संश्लेषण के द्वारा अपने भोजन का निर्माण स्वयं करते है।

नील हरित शैवाल (साइनो बैक्टीरिया), शैवाल, सुनहरा शैवाल

Note – सल्फर बैक्टीरिया, आयरन बैक्टीरिया उत्पादक तो है पर वह प्रकाश संश्लेषण नहीं करते है।

  • अमरबेल/कस्कूटा – उत्पादक की श्रेणी में नहीं आता है और प्रकाश संश्लेषण भी नहीं करता है।

2. उपभोक्ता-(consumer)- प्रकृति के ऐसे जीव, जो भोजन के लिए उत्पादकों पर निर्भर रहते हे उन्हें उपभोक्ता कहा जाता है।

Consumers are of three types-

A. प्राथमिक उपभोक्ता

प्रकृति के ऐसे जीव जो भोजन के लिए प्रत्यक्ष रूप से उत्पादकों पर निर्भर रहे।

जैसे – शाकाहारी जीव- गाय, बकरी, हिरण, खरगोश, तोता, मैना, घोड़ा, मवेशी आदि।

B.  द्वितीयक उपभोक्ता

इस प्रकार के जीव जो अपना भोजन प्राथमिक उपभोक्ता से ग्रहण करते है, और खुद किसी ओर के शिकार बनते है।

यूटेकुलिरिस तथा नैफ्थींज घटपर्णी पादप है, जो द्वितीयक उपभोक्ता में आते है, जो नाइट्रोजन आपूर्ति के लिए सूक्ष्म जीवों को अपने अंदर ले लेते है।

C. तृतीयक उपभोक्ता/शीर्षस्थ उपभोक्ता

ये अपना भोजन प्राथमिक तथा द्वितीयक उपभोक्ता से ग्रहण करते हैं तथा ये अन्य जीवों को शिकार नहीं बनाते है।

उदाहरण :-

उच्च मांसाहारी, सर्वाहारी जैसे – शेर, बाघ, तेंदुआ, बाज, मानव

अपघटक/अपमार्जक/मृतोपजीवी

  • इस प्रकार के जीव अपना भोजन मृत जीवों से प्राप्त करते है।
  • ये अपना भोजन जटिल कार्बनिक पदार्थों से ग्रहण करते है।
  • ये जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल कार्बनिक पदार्थों मे तोड़ते हैं।
  • ये खनिजों के पुर्नचक्रण में सहायता करते है, इसलिए इन्हें पारिस्थितिकी तंत्र के मित्र कहा जाता है।
  • जैसे – जीवाणु, कवक, प्रोटोजोआ, हेल्मन्थीज

पोष स्तर –

खाद्य श्रृंखला :-

  • पारिस्थितिकी तंत्र में सभी जीव भोजन के लिए एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं तथा भोजन की निर्भरता के आधार पर छोटी-छोटी शृंखलाओं का निर्माण होता है, जिसे खाद्य शृंखला कहा जाता है।  
  • खाद्य शृंखला में ऊर्जा का प्रवाह सदैव एक दिशीय होता है।

1. चारण खाद्य श्रृंखला

 इस प्रकार के खाद्य शृंखला में प्रत्येक पोष स्तर पर जीवों का आकार बढ़ता है तथा जीवों की संख्या घटती है।

घास  →  बकरी   →  कुत्ता  →    भेड़िया    →  शेर

घास  →   खरगोश  →  भेड़िया  →   शेर

2. परजीवी खाद्य श्रृंखला

इस प्रकार की खाद्य शृंखला में प्रत्येक पोष स्तर पर जीवों की संख्या बढ़ती है तथा आकार घटता है।

जैसे –      पेड़      →  चिड़िया    →    जूँ

3. अपरद खाद्य श्रृंखला  

यह सबसे छोटी खाद्य शृंखला होती है।

इस प्रकार की खाद्य शृंखला मृत जीवों से आंरभ होकर अपघटकों पर समाप्त हो जाती है।

इस प्रकार की खाद्य शृंखला यह प्रदर्शित करती है कि पारिस्थितिकी तंत्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए उत्पादक तथा अपघटकों की आवश्यकता होती है।

खाद्य जाल (food web)

छोटी-छोटी खाद्य शृंखलाऐं मिलकर एक जाल का निर्माण करती है, जिसे खाद्य जाल कहा जाता है।

  • घास  टिड्डा  मेंढ़क  साँप  मोरखाद्य जाल में जिसकी इच्छा है, वो खाये इसलिये वास्तविक है।
  • खाद्य जाल हमेशा वास्तविक होता है।
  • खाद्य जाल जितना जटिल होगा, पारिस्थितिकी तंत्र उतना ही स्थायी होगा।

पारिस्थितिकी पिरामिड/एल्टोनिय पिरामिड-

खोजकर्ता – एल्टॉन

– पारिस्थतिकी तंत्र में विभिन्न पोष स्तर पर जीवों की संख्या, जीवों का भार तथा ऊर्जा में अंतर पाया जाता है तथा इन अंतर को एक ग्राफ में प्रदर्शित करते है, जिसे पिरामिड कहा जाता है।

– पिरामिड बनाते समय उत्पादक को सदैव आधार में रखा जाता है।

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